जनाबे ज़ैनब स आ की अज़ीम क़ुर्बानिया

जनाबे  ज़ैनब स आ की अज़ीम क़ुर्बानिया
जनाबे ज़ैनब की विलादत हालाते ज़िन्दगी और मनाक़िब और मुफाहिर ke सिलसिले मे मशहूर उलेमा और मुजुर्ग़ मुहद्सासीन ने बहुत सी किताबेंलिखी है और और हाथ हालत को सब्त फ़रमाया है. 
जिसकी शारहा और तफ़्सीर बहुत ज़्यादा है   मुख़्तसरन is मुअज़्ज़मा बीबी के  बारे मे गुज़ारिशात पैश करना चाहता हु.
इस बीबी के साले विलादत मे बहुत इख्तिलाफ है इक क़ौले आम्मा ही की साले 5 हिजरी ,और बाज़ का कहना है की 6 हिजरी, और बाज़ का कहना है 7 हिजरी और बाज़ ने 5 जमादुस्सानिया का ज़िक्र किया है और बाज़ ने 1 शाबानुल मुअज़्ज़म का तज़केरा किया है उन दिनों मे हुज़ूरे  अनवर सफर मे थे लेहाज़ा अमीरुल मोमनीन ने अपनी बच्ची के नाम के लिए हुज़ूर का इंतेज़ार किया .
ता की पैग़म्बरे इस्लाम इमाम हसन और इमामे हुसैन की तरह ये नाम भी खुद रखये. 
क्यों की ये शरिक़तुल हुसैन बीबी हैं .
जिस वक़्त खत्मी तशरीफ़ लाइए तो आग़ोशे ज़हरा से शरिक़तुल हुसैन बीबी को उठाकर पैगंबरे इस्लाम की आगोश मे दिया गया तो आप ने वही का इंतेज़ार किया जिब्रईले अमीन ने आ कर अर्ज़ किया की हुज़ूर बारगाहे इलाही मे इस मुअज़्ज़मा का नाम ज़ैनब तजवीज़ किया गया हैं (कबीरतुल अहमर )इस ज़मन मे रेसालत मअब ने ज़ैनब स आ फ़रमाया की जैसा रावआ यत मे हैं की रसूल अल्ल्हा ने इस बच्ची का बोसा लिया और चहरेअक़दस को चहरे अनवर पे रखा तो आप की चश्मे मोबारक से आँसू जारी हो गये तो haazरीन ने आप के रोने का सबब पुछा फ़रमाया जो मै जानता हो तुम्हे नहीं मालूम ये बच्ची मेरे हुसैन के मिशन मे शरीक हैं. 
मनाक़िब जनाबे ज़ैनब बहुत हैं. बस इख्तिसार से मुलाहेज़ा फरमाए ....
फ़ज़ाइले जनाबे ज़ैनब स आ 
जब जनाबे ज़ैनब मनाक़िब के ईतबार से .
जनाबे ज़ैनब इल्मो तक़वा की हैसियत से और उम्दा इख़लाक़ के इतबार से और करामत के इतबार से बिलकुल अपने भाई हुसैन आ स की तरह थी और आप  को बचपन से ही रूहानी इतेसाल की वजह से अपने भाई हुसैन आ स के साथ इसक़द्र मुहब्बत थी की इक दिन या इक रात भी भाई के बगैर आराम ना फरमाती थी .
यहाँ तक की जब आप के चाचा के बेटे जनाबे अब्दुल्ल्हा इब्ने जाफरे तैय्यार shaadiशादी के सिलसिले मे मौला अली  के पास आये तो अपने मुताबिक़ हक़्क़े मह्र जनाबे फातिमा ज़हरा इस शर्त को क़ुबूल फ़रमाया और इन दो शर्तो के साथ अक़्द किया .
पहली शर्त ....
की रात दिन मे इक बार ज़रूर इजाज़त देना की वोह अपने भाई हुसैन के चेहरे को देख ले क्यूकि ये हो ही नहीं सकता की दिन गुज़र जाये और बहन भाई को ना देखे. 
दूसरी शर्त  ....
जब इसका भाई मदीना छोड़ कर जाने लगे तो ज़ैनब को हरगिज़ ना रोकना बल्कि साथ जाने की इजाज़त देना. ..
ये दोनों शर्त इस बात का बय्यन सुबूत हैं की बही बहन मे कितनी मुहब्बत थी जिसके बगैर अली आ स ने अक़्द नहीं किया और शायद यही वजह थी की जब जनाबे ज़ैनब ने भाई के साथ जाने की इजाज़त मांगी तो बगैर ताख़ीर के जनाबे अब्दुल्ल्हा ने इजाज़त दे दी ...

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