इमाम हुसैन आ स की मज़लूमि का असर

इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूमी सुन कर शिया होने वाला इंडोनेशिया का वहाबी परिवार

एक बार मेरे कानों में एक मजलिस की आवाज़ पहुंची जिसमें इमाम हुसैन अ.स. पर होने वाली मुसीबत को बयान किया जा रहा था, मैं सुन कर लरज़ गया, उस से पहले मेरे दिमाग़ में वहाबियत के अक़ाएद ही थे, जबकि हमारे शौहर शिया मज़हब क़ुबूल कर चुके थे, वह मुझ से शिया अक़ाएद के बारे में बताते, मैं उनका सम्मान करती लेकिन उसको क़ुबूल नहीं कर पा रही थी, कि तभी मेरे दिल में मारेफ़त का चिराग़ रौशन हो गया।

 इस लेख में एक ऐसे परिवार के इंटरव्यू को पेश किया जा रहा है जिसने अपने शिया होने के कारण को इमाम हुसैन अ.स. पर होने वाले ज़ुल्म को बताते हुए कहा कि, एक बार मेरे कानों में एक मजलिस की आवाज़ पहुंची जिसमें इमाम हुसैन अ.स. पर होने वाली मुसीबत को बयान किया जा रहा था, मैं सुन कर लरज़ गया, उस से पहले मेरे दिमाग़ में वहाबियत के अक़ाएद ही थे, जबकि हमारे शौहर शिया मज़हब क़ुबूल कर चुके थे, वह मुझ से शिया अक़ाएद के बारे में बताते, मैं उनका सम्मान करती लेकिन उसको क़ुबूल नहीं कर पा रही थी, कि तभी मेरे दिल में मारेफ़त का चिराग़ रौशन हो गया।
यह बयान इंडोनेशिया की रहने वाली सीती वरदा अल-जन्नत का है, जिनके शौहर पहले ख़ुद शिया हुए फिर इनसे शिया मज़हब क़ुबूल करने को कहा, यह पहले क़ुबूल करने को तैय्यार नहीं थी, लेकिन बाद में क़ुबूल कर लिया, वह उस समय तक वहाबियत की तबलीग़ कर रही थीं और उन्होंने सोंचा भी नहीं था कि कभी शिया अक़ाएद को अपनाएंगी, लेकिन अब उनका बयान है कि शिया मज़हब अपना कर उनको जो सुकून और आराम मिला है उसे वह किसी दूसरी चीज़ से बदलने का तैय्यार नहीं हैं, और वह अपने आप को इमाम हुसैन अ.स. का क़र्ज़दार समझती हैं, उनके शौहर अहमद मरज़ूक़ी जो PHD कर रहे हैं उन का भी कहना है कि हम अल्लाह की इस नेमत पर शुक्र अदा करते हैं।
अब हम उनके इंटरव्यू का कुछ भाग यहां पेश कर रहे हैं।
जब उनसे पूछा गया कि क्या आप शादी से पहले शिया हो चुके थे, तो अहमद मरज़ूक़ी ने बताया कि शादी से पहले सुन्नी मज़हब था, और उस समय मैंने ईरान के इंक़ेलाब के बारे में सुना और इमाम ख़ुमैनी र.अ. की ओर काफ़ी आकर्षित हुआ और उनके विचारों को जानने के लिए उनकी किताबें पढ़ना शुरू कीं, उसी समय से मेरे अंदर शिया मज़हब की ओर झुकाव पैदा हो गया था लेकिन मैं शादी के समय शिया नहीं हुआ था।
यही सवाल जब उनकी बीवी से पूछा गया तो उन्होने कहा कि वह शादी से पहले वहाबी थीं, और सोंचा भी नहीं था कभी कि मैं शिया मज़हब क़ुबूल करूंगी, और शादी के समय यह तो पता था कि मेरी शादी जिस से हो रही है वह शिया मज़हब के बारे में खोज कर रहे हैं लेकिन यह नहीं सोंचा था कि वह शिया हो जाएंगे, मेरा कॉलेज जो कि वहाबियों का था वहां टीचर्स वग़ैरह क्लास के अलावा हम लोगों को बिठा कर वहाबियत के विचारों को बताते थे जिसके चलते मेरे अंदर थोड़ी थोड़ी कट्टरता आने लगी थी।
जब सीती वरदा अल-जन्नत और उनके शौहर से उनके शिया होने के बारे में पूछा गया तो सीती वरदा ने बताया कि हमारी शादी को कुछ समय बीत चुका था तब मुझे समझ में आया कि मेरे शौहर शिया मज़हब से काफ़ी प्रभावित हैं, और उनके विचारों के बारे में अध्धयन कर रहे हैं, उनको भी मालूम हो चुका था कि मेरा झुकाव वहाबियत की ओर है, मेरे परिवार वाले इस विषय को लेकर को डरे हुए थे, मेरी ख़ाला का बेटा जो मेरे शौहर का दोस्त था उसने मेरे शौहर से इस विषय को लेकर बात की, मेरे परिवार वाले इसलिए चिंतित थे क्योंकि वहाबियत के विचारों के अनुसार बहुत सारी जाएज़ चीज़ें भी हराम हैं जैसे घर में टीवी का रखना, सरकारी नौकरी करना और भी बहुत चीज़ें इसी तरह हैं, तो ऐसे में आने वाले समय में मेरे और मेरे शौहर के बीच बहस और तकरार लाज़मी थी, अभी थोड़ा समय ही बीता था कि मेरे शौहर ने शिया होने का ऐलान कर दिया, अब आप ख़ुद सोंचिए मैं एक वहाबी विचारों की हो कर जिस ने सालों शियों के विरुध्द लेक्चर और तक़रीरें सुनी हो कैसे एक शिया के साथ ज़िंदगी गुज़ार सकती थी, मेरे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं।
हमारी कई बार आपस में बहस हुई, अधिकतर मुझे उनके विचारों से तकलीफ़ होती थी, मेरे शौहर मुझे बार बार शियों की किताबें पढ़ने के लिए कहते, शियों की अक़्ली बातों और सही विचारों को मेरे लिए बयान करते थे, और मुझ से हमेशा यही कहते कि जो बातें वह बताते हैं मैं उन पर ध्यान दूं उनके बारे में सोंचूं, मैंने भी कुछ दिनों बाद उनकी बातों पर ध्यान देना और उनके बारे में सोंचना शुरू कर दिया, कुछ दिन सोंचने के बाद मेरे शौहर की बातें की बातें मेरे दिमाग़ से निकल ही नहीं रही थीं, मैंने बहुत सोंचा लेकिन अपने शौहर की बातों का कोई जवाब न दे सकी।
जब यह पूछा गया कि कब तक यह हालात चलते रहे तो इस पर उन्होंने कहा यह सब काफ़ी दिनों तक चलता रहा फिर एक दिन मेरे शौहर ने मुझे एक सी डी सुनने के लिए दी, मैंने पूछा सी डी में क्या है, उन्होंने कहा सुनो इसको, मैं आज तक उस दिन को भूल नहीं पाई, मैंने सी डी सुनने के लिए लगाई, उसमे  इमाम हुसैन अ.स. के मसाएब थे, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या हो रहा है, ऐसा लग रहा कि ख़ुदा हमारे दिल में मारेफ़त को डाल रहा है, मुझ से इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूमी सुन कर रहा नहीं गया, और मैंने सच्चे दिल से शिया मज़हब को क़ुबूल कर लिया, और उसी दिन से इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारते आशूरा पढ़ने की पाबंद हो गई, और अब मेरा अक़ीदा यह है कि अगर इमाम हुसैन अ.स. न होते तो शिय मज़हब बाक़ी न रहता, मेरी नज़र में मुर्दा ज़मीरों का दोबारा ज़िंदा करने का नाम हुसैन अ.स. है, क्योंकि मेरे शौहर की इतनी दलीलें वह काम नहीं कर सकीं जो इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूमी ने कर दिखाया, मेरे शौहर का भी यही कहना है कि मेरी हिदायत पाने में भी इमाम हुसैन अ.स. का अहम किरदार है।
फिर उन्होंने यह भी बताया कि, इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी के प्रभाव से वहाबी हैरान हैं, यहां तक कि कुछ साल पहले इंडोनेशिया जैसे देश में जो कि शांतिपूर्वक देश है वहाबियों का एक गिरोह ने डंडे, तलवारों और चाक़ुओं से एक मजलिस में आए मोमेनीन पर हमला कर दिया था, और उन वहाबियों ने हुकूमत में अपनी पहुंच का प्रयोग करते हुए अज़ादारी को बंद भी करवा दिया था।

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