सीएए और आर्टिकल 370 पर यूरोपीय सांसदों के रुख़ से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार सवालों के घेरे मे






यूरोपीय संसद जहां जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को ख़त्म किए जाने और धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाले नागरिकता के नए क़ानून के ख़िलाफ़ पेश किए जाने वाले प्रस्तावों पर चर्चा करने की तैयारी कर रही है, वहीं मोदी सरकार ने इन मुद्दों को आंतरिक मामला बताते हुए यूरोपीय संसद के इस क़दम की कड़ी आलोचना की है।
751 सदस्यों में से 626 सदस्यों ने सीएए और जम्मू व कश्मीर की स्थिति को लेकर 6 प्रस्ताव यूरोपीय संसद के पटल पर रखे हैं, जिन पर 29 जनवरी को बहस के बाद 30 जनवरी को वोटिंग होगी।
यूरोपीय संसद में इन प्रस्तावों के कारण विश्व में जहां सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत की छवि को झटका लगेगा, वहीं यूरोपीय देशों से नई दिल्ली के संबंध भी किसी हद तक प्रभावित होंगे।
प्रस्तावों में उल्लेख किया गया हैः मई 2019 में नरेन्द्र मोदी के फिर से प्रधान मंत्री बनने के बाद से बीजेपी सरकार ने अपना राष्ट्रवादी एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया है, जिसके तहत धार्मिक और राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है और उन्हें डराया धमकाया जा रहा है और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज किए जा रहे हैं, सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विरोध की हर आवाज़ को ख़ामोश करने का प्रयास किया जा रहा है।
अगस्त 2019 में कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक अधिकार को समाप्त कर दिया गया, जबकि राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव पर अमल नहीं किया गया, जो कश्मीरियों को अपना भविष्य ख़ुद निर्धारित करने के लिए जनमत संग्रह के आयोजन पर बल देता है।
11 दिसम्बर 2019 को भारतीय संसद ने नागरिकता के 1955 के क़ानून में संशोधन करके नया क़ानून सीएए पारित किया, जिसमें धर्म के आधार पर मुसलमानों को अलग थलग किया गया है। यह क़ानून भारतीय संविधान की लोकतांत्रिक रूह पर एक चोट है।
इसके अलावा, सीएए नस्ल, रंग, राष्ट्रीय या जातीय मूल के आधार पर नागरिकता से वंचित करने से रोकने के लिए भारत के अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन करता है। सीएए अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकार संधि (ICCPR) तथा यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स (UDHR) के अनुच्छेद 15 का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि सभी को नागरिकता का अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को उसकी राष्ट्रीयता से वंचित नहीं किया जा सकता।
राष्ट्र संघ के मानव अधिकारों के उच्चायुक्त ने सीएए को मौलिक रूप से भेदभाव करने वाला क़रार दिया है, इसी के साथ भारत द्वारा पीड़ितों को शरण देने के प्रयासों का स्वागत करते हुए कहा गया है कि यह प्रयास भेदभाव करने के माध्यम से नहीं किए जाने चाहिएं।
आगे कहा गया है कि सीएए के ज़रिए नागरिकता निर्धारित करने का यह एक ख़तरनाक तरीक़ा है, जिसके कारण करोड़ों लोग अपनी नागरिकता खो सकते हैं और विश्व के सामने सबसे बड़ा प्रवासी संकट खड़ा हो सकता है। 

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