मक़सद नए रुख़ का मूल्यांकन है, कोरोना के बाद क्या नया मिडिल ईस्ट जन्म ले रहा है

पश्चिमी एशिया के इलाक़े में एक बड़े बदलाव की शुरुआत के इशारे मिल रहे हैं। ईरान ने अपना पुराना स्टैंड फिर दोहराया है कि वह क्षेत्र में शांति व सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय देशों से बिना शर्त वार्ता के लिए तैयार है।




कुवैत के अमीर शैख़ सबाह अलअहमद अलसबाह और ईरान के राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहानी के बीच सोमवार को फ़ोन पर बातचीत हुई जिसमें क्षेत्र के हालात और कोरोना वायरस की महामारी से मुक़ाबले का मुद्दा चर्चा में आया।
ईरान क्षेत्र के देशों को यह समझाने की कोशिश लगातार कर रहा है कि फ़ार्स की खाड़ी के इलाक़े में शांति और स्थिरता क्षेत्रीय देश आपस में मिलकर सुनिश्चित कर सकते हैं अगर इस इलाक़े में अमरीका या दूसरी बाहरी ताक़तों की दख़लअंदाज़ी जारी रही तो तनाव पैदा होगा। हालिया दिनों अमरीकी युद्धपोत और ईरानी युद्धक नौकाओं का आमना सामना होने की घटनाएं हुईं जो इसका उदाहरण हैं।

ईरान के विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ भी दमिश्क़ की यात्रा पर गए हैं। टीकाकार इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य यह मान रहे हैं कि कई अरब देशों की ओर से हालिया दिनों में यह इशारे दिए गए हैं कि वह उस मज़बूत फ़्रंट के क़रीब आना चाहते हैं जिसका नेतृत्व ईरान कर रहा है और जिसे प्रतिरोध का मोर्चा कहा जाता है, जवाद ज़रीफ़ इस बदले हुए रुख़ की गहराई का मूल्यांकन करना चाहते हैं।
हालिया दिनों तीन महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। एक तो संयुक्त अरब इमारात के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ाएद ने सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद को फ़ोन किया। दूसरा फ़ोन मोरीतानिया के राष्ट्रपति मुहम्मद वलद अलग़ज़वानी ने किया और तीसरा फ़ोन ओमान के नए सुलतान हैसम बिन तारिक़ ने किया। यह तीनों फ़ोन सीरिया में मनाए जाने वाले ख़ास जश्न की मुबारकबाद के लिए थे मगर हक़ीक़त में यह इशारा था कि अरब देश अब सीरिया के साथ सहयोग का नया अध्याय शुरू करना चाहते हैं।
अलजीरिया के राष्ट्रपति अब्दुल मजीद तबून ने तो बड़ा साहसी क़दम उठाया। उन्होंने रशा टुडे से बातचीत में कहा कि सीरिया अरब लीग का संस्थापक मेम्बर है और अलजीरिया उसे या किसी अन्य अरब देश को नुक़सान नहीं पहुंचने देगा। अलजीरिया में अरब लीग का शिखर सम्मेलन होने वाला है और उसकी कोशिश होगी कि सीरिया भी इसमें भाग ले जिसकी सदस्यता अरब लीग ने निलंबित कर दी थी।
आजकल यह भी देखने में आ रहा है कि अगर कोई देश ईरान के क़रीब जाना चाहता है तो इसके लिए कभी इराक़, कभी सीरिया, कभी हिज़्बुल्लाह लेबनान और कही यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन को माध्यम बनाता है। वैसे फ़ार्स खाड़ी के देशों ने कोरोना महामारी के हालात को बुनियाद बनाकर ईरान से संपर्क भी किया है और तनाव कम करने की कोशिश की है। उनकी नज़रें कोरोना की महामारी के बाद विश्व स्तर पर राजनैतिक, आर्थिक और सामरिक क्षेत्रों में आने वाले भारी बदलाव पर टिकी हुईं जो बहुत तेज़ी से उभर कर सामने आ रहा है।
हालिया दिनों फ़ार्स खाड़ी, इराक़ और सीरिया के भीतर अमरीकी सैनिकों और नौसैनिकों की उत्तेजक कार्यवाहियों का मतलब यह है कि अमरीका अपने घटकों को यह संदेश देना चाहता है कि वह उनकी हिफ़ाज़त के लिए अभी मौजूद है और ईरान से टक्कर लेता रहेगा। मगर अमरीका की ओर से उसके पारम्परिक घटकों की निराशा चरम बिंदु पर पहुंच चुकी है

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